Thursday, 1 September 2016

हरियाणा विधानसभा सम्बोधन सोशल मीडिया में जंग

सोशल मीडिया में जंग छिड़ी । हरियाणा विधानसभा के सत्र के पहले दिन जैन मुनि आचार्य तरुण सागर जी के प्रवचन को लेकर जबरदस्त विवाद छिड़ा । उनके प्रवचन को कड़वे वचन का नाम दिया गया था और सभी पार्टियों के विधायकों ने पूरी तन्मयता से उनकी बातें सुनीं थी । उनके प्रवचन को लेकर दो तरह के विवाद हुए । एक विवाद तो किसी धर्म गुरू को विधानसभा में बुला कर प्रवचन कराने का है और दूसरा विवाद उनकी कही बातों का है। उन्होंने कहा है कि धर्म पति की तरह है और राजनीति पत्नी की तरह। उन्होंने कहा कि जैसे पत्नी पर पति का अंकुश जरूरी है वैसे ही राजनीति पर धर्म का अंकुश जरूरी है। इसे लेकर नारीवादी कार्यकर्ता और कॉमरेड लोग काफी भड़के गए। मुनि तरुण सागर द्वारा हरियाणा विधानसभा में संबोधन पर विपक्ष का हंगामा खासा है। खासकर वामपंथी बहुत बेचैन हैं। उन्हें लगता है कि तरुण सागर का प्रवचन कराकर हरियाणा सरकार ने गैर-संवैधानिक काम किया है। इनका कहना है कि विधानसभा के भीतर जैन मुनि तरुण सागर का प्रवचन कराकर हरियाणा सरकार ने धर्मनिरपेक्षता को अंगूठा दिखाया है। पर ऐसा नहीं है कि किसी धार्मिक साधु का प्रवचन पहली बार हुआ हो मगर चूंकि लोगों की याददाश्त इतनी कमजोर होती है कि पास का अतीत भी याद नहीं कर पाते। क्या अब बताना पड़ेगा कि संसद के सांसदों को छह दिसंबर 2005 को बौद्घधर्म गुरू दलाई लामा संबोधित कर चुके हैं पर तब इतना हंगामा शायद इसलिए नहीं कटा था क्योंकि कुछ सिरफिरे ददलानी, पुनेवाला जेसे दलाई लामा को तो बर्दाश्त कर लेते हैं पर एक भारतीय धर्मगुरु को नहीं। कितनी ही बार पोप ने योरोप की संसदों को संबोधित किया हुआ है। मगर आज एक जैन मुनि ने संबोधित कर दिया तो कांग्रेसी साहबजादे कह रहे हैं कि जाकिर नाइक से भी विधायकों को ज्ञान दिलाओ। अब कौन बताए कि जाकिर नाइक एक धर्म प्रचारक है जबकि जैन मुनि तरुण सागर कोई प्रचारक नहीं बल्कि जैन अपरिग्रह के प्रतीक हैं। मगर यह बात न कांग्रेसी समझ सकते हैं न वामपंथी। तरुण सागर जी के व् दिगंबर संतो पर निर्वस्त्र रहने पर भी अंगुलियां उठाई जा रही हैं। पर वे यह सामान्य-सी बात भी नहीं समझ पा रहे हैं कि जैन दिगंबर मुनि इतने अपरिग्रही होते हैं कि वे कोई वस्त्र धारण नहीं करते और कोई भी मुनि यह तब ही कर सकता है जब वह समस्त विकारों से दूर हो जाए। जो व्यक्ति सारे सांसारिक विकारों से दूर हो गया हो तो उसके लिए वस्त्र धारण करना और न करना समान है। लेकिन इस दिव्यता तक पहुंचने के लिए तपस्या करनी पड़ती है जो कांग्रेसियों और वामपंथियों के लिए असंभव है। जैन मुनि ने जो उपदेश दिए वे कोई अजूबे नहीं बल्कि समरसता और न्यायपूर्ण समाज के लिए आवश्यक थे। आप सिर्फ एक धर्मविशेष की समस्या को सारे देश के लोगों पर लाद रहे हो। जातिवाद हिंदू समाज में है और वह राजनीतिकों का खेल है। वे इसे दूर नहीं करना चाहते बल्कि इसके बूते वे राजनीति के खेल करना चाहते हैं। पर जब दिमाग में शंका भरी हो तो किया ही क्या जा सकता है? मैं तो कहूंगा कि हरियाणा सरकार ने जैन मुनि का प्रवचन कराकर परोक्ष रूप से यह संदेश दिया है कि अपरिग्रही बनना मनुष्य के लिए सर्वोच्च प्रकृति है। अगर राजनीतिक इस प्रकृति को समझें तो शायद समाज के और लोग भी इसके अनुरूप आचरण करें। पर हल्ला करने वाले किसी भी आध्यात्मिक कृत्य को बस सांप्रदायिकता में देखते हैं।आज एक जैन मुनि के प्रवचन पर कांग्रेसी रोना रो रहे हैं पर वे क्या बता पाएंगे कि कांग्रेस की पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी स्वयं जैन मुनि महाराज विद्यासागर के पास जाया करती थीं और उनके समक्ष दंडवत होती थीं। मुनि विद्यासागर भी निर्वस्त्र रहते थे। इसी तरह कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी आदि नेता कई बार द्वारिकापीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद के पास दंडवत मुद्रा में गए हैं। उन्हें अपने आवास पर बुलाया है। जामा मस्जिद के शाही इमाम मौलाना बुखारी के लिए तो इनके घर के दरवाजे खुले रहते थे और ये पलक पांवड़े बिछाये उनका इंतजार करते थे। फिर एक अत्यंत अल्पसंख्यक समुदाय वाले जैन मुनि के प्रवचन पर इतना बावेला क्यों? क्या मार्क्सवादियों को बताना पड़ेगा कि उनके मुख्यमंत्री ज्योति वसु जब तक मुख्यमंत्री रहे उन्होंने एक बार भी ऐसा नहीं किया कि सेंट्रल पार्क की दुर्गा पूजा में शिरकत न की हो। अभी गत वर्षो केरल में जन्माष्टमी स्वयं मार्क्सवादियों ने अपनी पहल पर मनाई क्योंकि केरल में हिंदू ही माकपा का जनाधार हैं। हरियाणा सरकार ने यह पहल की है और इसके परिणाम भी सकारात्मक निकलेंगे। एक तो इस समुदाय को पहली बार यह संदेश मिला है कि अब वाकई भारत में अल्पसंख्यकों का सम्मान करने वाली सरकार है। जब आप संसद या विधायिकाओं में तमाम काले कारनामे वाले नेताओं के प्रवचन करा सकते हैं तो एक जैन मुनि के प्रवचन पर भला क्या आपत्ति हो सकती है? दूसरे एक आध्यात्मिक नेता के प्रवचन का अगर शतांश भी लाभ विधायक उठा पाएगे तो शायद वे अधिक बेहतर तरीके से अपने आचरण को दुरुस्त कर पाएंगे। सबसे पहले कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ता ने इस पर विवाद शुरू किया। कई कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने जैन मुनि को लेकर अपमानजनक टिप्पणी की। तरुण सागर जी निर्वस्त्र रहते हैं, इसे लेकर भी मजाक उड़ाया गया। लेकिन थोड़ी देर विवाद चलने के बाद अचानक सोशल मीडिया में जैन मुनियों के साथ इंदिरा गांधी और सोनिया गांधी और शीला दीक्षित आदि की फोटो की बाढ़ सी आ गई। 70 के दशक के आखिरी दिनों की एक फोटो शेयर की गई, जिसमें इंदिरा गांधी विद्यानंद ....
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Wednesday, 31 August 2016

जैन मुनि श्री तरुण सागर जी की मुनि चर्या पर टिप्पणी करने वाले कॉंग्रेस नेता तहसीन पूना वाला की दृष्टता पर कॉंग्रेस मूक दर्शक क्यों?

जैन मुनि श्री तरुण सागर जी की मुनि चर्या पर टिप्पणी करने वाले कॉंग्रेस नेता तहसीन पूना वाला की दृष्टता पर कॉंग्रेस मूक दर्शक क्यों?
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पिछले दिनों दिगम्बर परम्परा के जैन सन्त क्रन्तिकारी मुनि श्री तरुण सागर जी के हरियाणा सरकार के आमन्त्रण पर विधानसभा में हुए उदबोधन के पश्चात मुनि श्री की मुनिचर्या पर स्तरहीन कमेंट करने वाले व मुनि श्री के फोटो के समकक्ष अश्लीलता की जनक किसी कलाकार का चित्र नत्थी कर फ़िल्मी संगीतकार विशाल ददलानी ने अपनी मानसिक विकृति का परिचय दिया, और इसी स्वछन्द व निरंकुश वृति के द्योतक एंव बदजुबानी के प्रतीक कॉंग्रेसी नेता तहसीन पूनावाला द्वारा ददलानी के स्वर में स्वर मिला कर मुनि श्री की मुनिचर्या पर कटाक्ष एंव आपत्तिजनक टिप्पणियॉ करने के फलस्वरूप सम्पुर्ण जैन समुदाय में गहरा आक्रोश हैं, और स्वभाविक भी हैं कि अपने त्यागी-वैरागी साधू-सन्तों पर कुछ सिरफिरों के शाब्दिक हमले से सम्पुर्ण जैन समुदाय आहत हुआ हैं, चूँकि इस  वारदात का न बल्कि सम्पुर्ण जैन समाज की और से बल्कि विभिन्न धर्मो व विभिन्न मान्यताओं के लोगों ने भी पुरजोर आवाज में विरोध प्रकट किया हैं, तथा कुछ जगहों पर इन तत्वों के विरुद्ध क़ानूनी करवाई भी की गई हैं, आप पार्टी से जुड़े विशाल ददलानी के इस कृत्य पर आम आदमी पार्टी के सुप्रीमो श्री अरविन्द केजरीवाल ने पहले तथा दिल्ली के मंत्री एंव आप नेता श्री सत्येंद्र जैन ने मुनि श्री तरुण सागर जी से रूबरू मिल कर इस घटना के सन्दर्भ में माफ़ी मांगी हैं, हालाँकि ऐसे  कृत्य के लिए माफ़ी शब्द नाकाफी हैं, माफ़ी तो श्री अरविन्द केजरीवाल को इस बात के लिए भी मांगनी चाहिए कि दिल्ली विधानसभा में मुनि श्री तरुणसागर जी को उदबोधन हेतु आमन्त्रण देकर वे मुकर गए, दूसरी और तहसीन पूनावाला की मुनि श्री पर गलत टिप्पणी का समर्थन करने के बावजूद उन्हें ना तो कोई पश्ताताप हैं और ना ही कोई  अफ़सोस,उल्टा वह IBN -7 पर मुनि श्री तरुण सागर जी की मुनिचर्या पर बहस हेतु उतारू था, यानि उसे इस कृत्य पर किसी तरह की शर्मिंदगी नही हैं,  ताज्जुब यह हैं कि कॉंग्रेस पार्टी जिसमें अतीत में प्रकाश चन्द्र सेठी (मध्य प्रदेश) विरधी चन्द जैन (बाड़मेर) वर्तमान में भी जवाहर लाल दर्डा एंव विजय दर्डा, प्रदीप जैन आदि अनेक नेता रहे, उस पार्टी से जुड़ा एक युवा नेता जैन मुनि के विरुद्ध आपत्तिजनक टिप्पणी कर सम्पुर्ण जैन समुदाय की भावनाओं ठेस पहुंचाए और उस पार्टी का शीर्ष नेतृत्व मूकदर्शक बना रहे ये हैरान करने वाला दृष्टान्त हैं, कॉंग्रेस पार्टी को अविलम्ब रूप से तहसीन पूनावाला को पार्टी से बाहर का रास्ता बताना चाहिए,
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लेखक-गणपत भंसाली (सूरत)
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इस घटनाक्रम के पश्चात पुरे देश में इन तत्वों का विरोध हो रहा हैं, लेकिन विरोध के इस क्रम में हम सभी जैन समुदाय से जुड़े बन्धुओं को जोश के साथ होश भी रखना हैं, ऐसा ना हो कि हमारा विरोध का स्तर उसी पैमाने पर आकर खड़ा हो जाए जिसके लिए हमारा समाज संघर्ष रत हैं, हमे यह सावधानी बरतनी होगी कि सोश्यल मीडिया के फेसबुक, वाट्सएप व ट्विटर आदि माध्यमो से प्राप्त किसी ऐसे विवादास्पद मेसेज को पोस्ट या फॉरवर्ड करने से बचना हे जो कहीं विवाद को जन्म नही दे दे, हमारा एतराज दृष्टता करने वाले व्यक्ति से हैं अतः हम कोई ऐसी पोस्ट को प्रेषित ना करें जिसमें स्तरहीन भाषा का उपयोग किया गया हो या जाति सूचक व एतराज वाले शब्द इस्तेमाल किए गए हो, हमे यह स्मरण रखना चाहिए कि हम दया अहिंसा व करुणा के सन्देश से पोषित जैन समुदाय से जुड़े हुए हैं, हमारी भाषावली आपत्तिजनक एंव उतेजना को बढ़ावा देने वाली कदापि नही होनी चाहिए, हमे यह भी स्मरण रखना चाहिए कि हम इन दिनों क्षमा पर्व पर्युषण पर्व की आराधना में लीन हैं, आगामी दिनों दस लक्षण पर्व भी प्रारंम्भ हो जाएगा, अतः हमे यह हर सम्भव प्रयास करना हैं कि हमारा विरोध शांतिपूर्वक व शालीनता पूर्वक हो,
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गणपत भंसाली
Jasolwala@gmail.com

Thursday, 4 August 2016

काश इन नन्हे मुन्ने एवं युवा विद्यार्थियों की तरह हम भी रखते पॉजिटिव दृष्टिकोण

काश इन नन्हे- मुन्ने एंव युवा विद्यार्थियों की तरह हम भी रखते पॉजिटिव दृष्टिकोण
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गणपत भंसाली
हजारों नन्हें-मुन्ने एंव युवा विद्यार्थियों के बीच आज सुबह-सुबह कुछ लम्हें गुजारे, सचमूच में एक अलग व अनूठा अहसास, विद्यार्थी अनन्त ऊर्जा व जज्बे से लबालब, उनके चेहरे पर सर्वत्र छाई हुई बेतहाशा ताजगी , गजब का अल्हड़ पन एंव भरपूर मस्ती, सचमूच में असीम आनन्द की अनुभूति, प्रसङ्ग था हजारों विद्यार्थियों के बीच 12 नोनिहालों के सम्मानित होने का और अपने सहपाठियों के सम्मान में छात्र-छात्राओं ने तालियों की करतल ध्वनि ऐसी गजब से गूंजाई कि मानो आकाश गरज उठा हो ! काश हम उम्र में बड़े इस तरह की प्रमोद भावना रखते ? इस तरह का आपसी सोहार्द रखते. कितना सुखद अहसास होता हैं कि कुछ विजेता विद्यार्थियों के सम्मान में. और उस ख़ुशी में. तमाम के तमाम विद्यार्थियों के चेहरों पर खुशियों की बहार छा जाए. अनेकों सावन देख चुके हम अधिकांश किसी को सम्मानित होते देखते हैं तो मारे जलन के हमारा चेहरा तक मुरझा जाता हैं. और ये नन्हे मुन्ने औरों की ख़ुशी को अपनी ख़ुशी मान कर गुलाब की तरह खिल एंव महक उठते हैं. कितना पॉजिटिव दृष्टिकोण हैं इन नन्ही पौधों का. हम में से अधिकांश लोग मन्दिरों- मस्जिदों. गिरिजा घरों. देहरासरों. स्थानकों व समाज भवनों में पूजा-अर्चना एंव धर्म–ध्यान. तप-जप जैसे अनुष्ठानो तथा साधू- सन्तों आदि के प्रवचनों में सम्मिलित होते हैं. और ये नन्हे- मुन्ने बिना किसी अनुष्ठानो में सम्मिलित हुए एक- दूसरे के प्रति गजब की मैत्री एंव सोहार्द की भावना रखते हैं, आज 29 जुलाई को सुबह-सुबह करीब पौने नो बजे हम ट्रैफ़िक अवैयरनेस ग्रुप (टेग) के अध्यक्ष एंव युवा एडवोकेट श्री अरुण लाहोटी के नेतृत्व में वेसू स्थित अग्रवाल विद्या विहार स्कुल पहुंचे. विद्यालय के विशाल प्रांगण में चार अलग-अलग रंग के टी शर्ट में उपस्थित हजारों विद्यार्थियों की मौजूदगी से एक नयनाभिराम दृश्य दृष्टिगोचर हो रहा था. अग्रवाल विद्या विहार के प्रबन्धकों की इस सोच को नमन करता हूँ कि उन्होंने विद्यार्थियों के तन पर सजे इन टी शर्टों के पीछे वाले भाग पर जो नाम अंकित कराए, वे अतीत में कभी भारत के भाग्य विधाता रहे हैं. उन शख्सों के नाम इन टी शर्टों पर उकेरे गए थे. जिन्होंने अपने व्यक्तित्व एंव कर्तत्व से हिंदुस्तान का गौरव बढ़ाया. गहरा हरा. लाल. केशरिया व बल्यू कलर के टी शर्टों पर जिन किरदारों के नाम दिखाई दे रहे थे उनमे 'टेगोर' 'शिवाजी' 'रमण' व 'अशोका' जैसे महापुरुषों के नाम पर थे. इन विरले नामो के उल्लेख मात्र से ही गौरव की अनुभूति हो उठती हैं. बहरहाल चार अलग-अलग रंगों के परिधानों में सजे ये विद्यार्थी आज ट्रैफ़िक अवैयरनेस ग्रुप (टेग) द्वारा विगत दिनों यातायात जागरूकता अभियान के अंतर्गत आयोजित ड्राईंग कॉम्पिटेशन के विजेताओं को सम्मानित किए जाने के अवसर पर एकत्रित हुए थे. अध्ययन के कुछ लम्हों में से कुछ क्षण नियोजित कर वे इस सम्मान समारोह में शामिल हुए थे. हमारे 'टेग' समूह से अरुण लाहोटी. राजेश माहेश्वरी, मोहित अग्रवाल, रितेश लाहोटी, अनिल बोथरा तथा मेरा (गणपत भंसाली का ) भी समावेश था. 'टेग' सदस्यों ने ड्राईंग कॉम्पिटेशन के उन 12 प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को स्मृति चिन्ह प्रदान कर सम्मानित किया. जिन्होंने यातायात जागरूकता के उद्देश्य से मनमोहक ड्राईंग बनाई थी. 12 स्टूडेंट्स के आलावा स्कुल के अध्यापक श्री तेजस शाह. अल्पेश सर व बबिता मेम को भी सम्मानित किया गया. उल्लेखनीय हैं कि 'टेग' द्वारा कुछ माह पूर्व शहर की एल पी सवानी. अग्रवाल विद्या विहार. माहेश्वरी विद्यापीठ एंव ड्रीम हाई स्कॉलर के कुल दस हजार स्टूडेंट्स के बीच ट्राफिक अवयरनेश विषय पर ड्राईंग कॉम्पिटेशन आयोजित किया गया था, अतः इन चारों स्कूलों के विजेता प्रतियोगियों को हाल ही में अलग-अलग दौर में सम्मानित किया गया हैं

Saturday, 16 July 2016

गुरु महिमा

 
                                                                                      

गुरु महिमा ... मन मस्तिष्क में भाव अनगिनत थे ...लफ़्ज़ों का भी भण्डार था फिर भी भावों को लफ्ज़ो के साथ बांध पाना दुश्वार सा था ! कभी मिटाना कभी लिखना ...कब तक ..कहाँ तक ? आसमान की ऊंचाई और सागर की गहराई के असंख्य उदाहरण दिए जाते हैं ...लेकिन आज वो भी नाकाफी प्रतीत होते हैं ! तो फिर मेरी सच्ची सरकार ..मेरे गुरुदेव  की रहमतों का कैसे गुणगान करूँ ...?
कैसे बयां करूँ कि जब जब दुःख रुपी अंधकार में ज़िन्दगी बोझिल सी लगने लगती है तब मेरे गुरुदेव की रहमत रौशनी बन मेरे जीवन में उजियारा कर देती है ! मैंने अक्सर तकलीफों को पिछले दरवाज़े से जाते देखा है ...अक्सर खुशियों को आते देखा है ...जब से अपने गुरुदेव को अपना हाथ थामे देखा है ..! कई बार जीवन में ऐसे पड़ाव आये जब लगा कि दुःख अंतहीन हैं ..कैसे इनका सामना करूँ ? तब एक अदृश्य शक्ति ने हमेशा सहारा दिया ...आंसुओं से भरी पलकों और भारी मन में व्याप्त आशंकाओं का निवारण किया ...मेरे सतगुरु ..मेरे गुरुदेव ने ..जब भी मैंने सिमरन किया ,सच्चे मन से जब भी याद किया ! इंसानी फितरत होती है न अपने दुःख तकलीफों से निजात पाने के लिए हम कितने ही पाठ पूजा , व्रत उपवास और ना जाने कितने ही प्रयासों में लगे रहते हैं कि शायद ऐसा करने से हम जल्दी ही अपने दुखो से छुटकारा पा लेंगे ! इसी कवायद में लगे रहते हैं जब तक की दुःख तकलीफ समाप्त न हो जाए ! पर भूल जाते हैं कि जीवन में फूल हैं तो कांटे भी हैं, लेकिन हम काँटों की चुभन से हमेशा दूर भागते हैं ! हाँ, एक रास्ता है अपने जीवन के इन काँटों को निकाल फेंकने का ..वो है अपने गुरु की शरण अर्थात गुरु भक्ति ! ! श्रद्धा विश्वास का जो स्वरुप भक्ति में प्रवाहित होता है वह इंसान का ईश्वर के प्रति प्रेम का ही स्वरुप है ! ईश्वर के इसी स्वरुप को एक भक्त अपने दृष्टिकोण से ..अपने इष्ट देव में अपने आरध्य में देखता है ! इसी एक दृष्टिकोण का एक एक स्वरुप है ..गुरु ...! ईश्वर के ओजस रूप का प्रतिबिम्ब है गुरु ! गुरु ...एक ऐसी शक्ति जो हमारा हाथ थाम कर हमे उस अदृश्य शक्ति तक पहुँचाने का स्त्रोत्र है जिसे हम मानते हैं अपने हृदय के अंतर्मन से ...कि ईश्वर एक शक्ति है ...जो हमारे अंदर ही विदयमान है पर हम उस ईश्वर को उस शक्ति को पहचान नहीं सकते ! इसी शक्ति से ...ईश्वर के स्वरुप से साक्षात्कार करवाते हैं हमे हमारे गुरु ...कहते भी है न ..
गुरु गोविन्द दोउ खड़े काके लागु पाए
बलिहारी गुरु आपनो जिन गोविन्द दियो मिलाये
                                      अर्थात अगर मेरे समक्ष ईश्वर और गुरु दोनों खड़े हैं तो मैं अपने गुरु पर ही बलिहारी जाऊं जिन्होंने मुझे गोविन्द यानि उस ईश्वर से मिलवाया ! सृष्टि के रचयिता ईश्वर हैं तो उस सृष्टि के सरंक्षक गुरु अपने भक्तो का सैदेव ही कल्याण करते हैं !ईश्वर को पाने तक के सफ़र में यदि कोई हमारा साथ निभाता है तो वो हैं हमारे गुरु ! हर इंसान अपने अपने भावो द्वारा अपने प्रेम को ,अपनी भक्ति को ईश्वर के लिए दर्शाता आया है ! पुरातन समय महाभारत ,रामायण के दौरान भी गुरुओं ने अपनी अहम् भूमिका निभाई है ! इंसान ही क्या स्वंयम राम भगवान् ने भी अपने जीवन ,में गुरु वशिष्ट को उच्चतम  दर्ज़ा दिया ! कृष्ण भगवान् ने गुरु अग्रचार्य को अपना गुरु माना ! गुरुनानक देव जी से लेकर दशम पातशाह गुरु गोविन्द सिंह जी तक गुरु अपने हर स्वरुप में अपने भक्तो का मार्ग दर्शन करते आयें हैं! उस निराकार ईश्वर के ओजस का प्रतिबिम्ब है गुरु ...!
अंग संग सहाई बनकर ..कभी हमारे मार्ग दर्शक बनकर ..कभी हमारे सखा बनकर, जीवन की हर विपत्ति में हमारा उद्धार करना ...जब हमारे अपने हमसे मुंह मोड़ ले ..तब एक ही दिव्य शक्ति हमारे संग हमारी ऊँगली थाम कर आगे ले चलती है ! हमे डगमगाने नहीं देती ...! जीवन के हर अवरोध ..हर विघ्न को दूर करना और हमे खुशियों के ख़ज़ाने से फलीभूत करते हैं हमारे गुरु ! बस आवश्यकता है श्रद्धा और विश्वास की ...हमारे गुरुओं की शक्ति को पहचानने की !
          एक अँधा आदमी मंदिर में जाता है !हर कोई उसे देखकर हैरान होता है उअर वह खड़े लोगो में से कोई एक उस अंधे आदमी से पूछता है ..''आप भगवन को देख नहीं सकते फिर आप मंदिर में रोज़ क्यों आये हो ? .
तो अँधा आदमी कहता है ...''तो क्या हुआ ? मैं भगवान को नहीं देख सकता परन्तु भगवान तो मुझे देख ही सकते हैं न ?   अर्थात ऐसी ही श्रद्धा और विश्वास होना चाहिए हमे भी तभी हमारे अंधकार मय जीवन में उजाला होगा ! पर इस उजाले का वरन करने हेतु भी तो हमे हमारे सम्पूर्ण गुरु शक्ति चाहिए वरना उस उजाले का फ़ायदा ही क्या ? सूरज तो सम्पूर्ण जगत को अपना प्रकाश देता है पर यदि कोई इंसान बंद कमरे में ही बैठा रहे और अंधकार को कोसता रहेगा तो उस में सूरज का क्या दोष ? अतः ....
                     चिंतन जब निश्छल होगा 1
                     गुरु के प्रति समर्पित होगा
                     वाणी स्वतः ही मधुर होगी
                     मन निश्चय ही निर्मल होगा
                     दुःख संकट तेरा हर दूर होगा
                     गुरु का हाथ तेरे सर पर होगा
  कण कण में विद्यमान ...ज़र्रे ज़र्रे में शामिल ..हर रिश्ते में समाया ..कभी पिता सा सरंक्षण ..कभी माँ जैसा दुलार ..कभी मित्र की तरह पथ प्रदशक बन कर हमारा मार्ग दर्शन करते हैं ...हर रिश्ते की सम्पूर्णता लिए एक ऐसा रिश्ता ...गुरु और भक्त का ...बस उस रिश्ते को निभाने की कवायद करनी होगी ..सिमरन करके ...विश्वास करके .. ! एक बार श्रद्धा से गुरु महिमा रुपी ऊँगली थाम कर तो देखिये ..हमारे समस्त जीवन की डोर हमारे गुरु थाम लेंगें !
               
                   सतगुरु मेरे तेरी रहमतों का कोई हिसाब नहीं
                   मैं मांगने से थकती नहीं तू देने से थकता नहीं
                   सिलसिला ये यूँ ही बरक़रार रहे सतगुरु मेरे
                   कि तेरी कृपा से झोली हमेशा मेरी भरी रहे
              आमीन ... रश्मि तारिका... सूरत

Friday, 15 July 2016

आतंकवाद तेरा धर्म नही ..डॉ सुलक्षणा विकास



ऐ जाकिर! जिंदगी में पहली मर्तबा तूने कुछ सही कहा,
 चल आंतकियों को सजा देने का हक अल्लाह का रहा।
 तेरे इस ब्यान ने हमारी सेना का काम आसान कर दिया, 
आंतकियों को अल्लाह से मिलाने का जज्बा भर दिया।
 अब सेना उन्हें गिरफ्तार करने की बजाए मार गिराएगी,
 उनकी रूह को पल भर में उस अल्लाह से मिलवाएगी। 
 फिर उस अल्लाह की मर्जी उन्हें सजा दे या ईनाम बख्शे,
 उन्हें चाहे दोज़ख़ बख्शे या जन्नत की हूरें तमाम बख्शे।
 पर मेरे जेहन में उठते सवाल का बता कब जवाब देगा,
 आंतकवाद का कोई धर्म नहीं फिर क्यों वो हिसाब लेगा।
 जाकिर! तेरे जवाब का मुझे बड़ी बेसब्री से इंतजार रहेगा, 
सुलक्षणा की कलम के आगे छोटा तेरा हर हथियार रहेगा।
 ©® डॉ सुलक्षणा अहलावत

Thursday, 14 July 2016

जब जब लोगों के हुजूम में अकेलापन चुभने लगता है

जब जब लोगों के हुजूम में अकेलापन चुभने लगता है,
तब बीते हुए उन लम्हों की यादों में मन डूबने लगता है।

याद आने लगता है बचपन का वो मस्ती भरा हुआ दौर,
शीशम के डाल पर डले झूले पर मन झूलने लगता है।

साईकिल के टायर की दौड़ याद आती है पहले ही पल,
दूसरे ही पल में मन जोहड़ में नहाकर सूखने लगता है।

कभी मिट्टी के खिलौने कभी माचिश के ताश बनाता है,
देख लगे आम जामुन अपने आप मन रुकने लगता है।

आकाशवाणी के रोहतक व दिल्ली चैनल की रागनियाँ,
साथ में टेलीविजन का लकड़ी का स्टर खुलने लगता है।

कभी मोटे फ्रेम का दादी का चश्मा लगाता है मन मेरा,
कभी मन गुड़गुड़ा कर हुक्का दादा का छुपने लगता है।

कभी कोने में रखे मिट्टी के चूल्हे से राख निकालता है,
कभी दादी के चरखे के सूत सा यादों से जुड़ने लगता है।

कभी बनाता है मोर चंदों से गाय भैंसों बैलों की माला,
कभी हरियाली देखने को मन खेतों में घूमने लगता है।

सच में हर जगह सुकून था, हर किसी से अपनापन था,
अक्सर मन उन सुनहरी यादों में खोकर उड़ने लगता है।

आनंद मिलता है बीते लम्हों की यादों की भूल भुलैया में,
वापिस लौटते ही यादों से सुलक्षणा मन दुखने लगता है।

©® डॉ सुलक्षणा अहलावत

Monday, 11 July 2016

देश के ईमानदार एंव सादगी पसन्द प्रधानमन्त्री लाल बहादुर शास्त्री, जिनका कार के लिए लिया गया 5 हजार का ऋण चुकानें हेतु पास में पैसे नही थे, देहान्त बाद पत्नि ने पेंशन के पैसों से अदा किया भुगतान

देश के ईमानदार एंव सादगी पसन्द प्रधानमन्त्री लाल बहादुर शास्त्री, जिनका कार के लिए लिया गया 5 हजार का ऋण चुकानें हेतु पास में पैसे नही थे, देहान्त बाद पत्नि ने पेंशन के पैसों से अदा किया भुगतान
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यह ऐसे प्रधानमंत्री हुए जिन्होंने 1965 मेंअपनी फिएट कार खरीदने के लिए पंजाब नेशनल बैंक से पांच हजार ऋण लिया था। मगर ऋण की एक किश्त भी नहीं चुका पाए। 1966 में देहांत हो जाने पर बैंक ने नोटिस भेजा तो उनकी पत्नी ने अपनी पेंशन के पैसे से कार के लिए लिया गया ऋण चुकाने का वायदा किया और फिर धीरे धीरे बैंक के पैसे अदा किए। हम बात कर रहे हैं प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री की। उनकी पत्नी ललिता शास्त्री ने भी उनकी ईमानदार पूर्वक जिंदगी में उनका पूरा साथ दिया। शास्त्री की यह कार आज भी जनपथ स्थित उनकी कोठी [अब संग्रहालय] में आज भी मौजूद है। अब इस कोठी में लालबहादुर शास्त्री संग्रहालय बना दिया गया है। पढ़ें: शास्त्री का अस्थि कलश संग्रहालय में 'कैद' इस संग्रहालय में अनेक ऐसी चीजें प्रदर्शित की गई हैं। जो उनकी ईमानदारी को दर्शाती हैं। लोग यहां आकर उनकी सादगी और ईमानदारी भरी जिंदगी के बारे में जानकर भावुक हो जाते हैं। ऐसी एक घटना के बारे में बताना जरूरी हो जाता है। यह बात 1962 के करीब की है। उस समय शास्त्री जी अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव थे। उस समय देश के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू थे। उन्हें पार्टी के किसी महत्वपूर्ण काम से कश्मीर जाना था। पंडित नेहरू ने उनसे जाने के लिए कहा तो वह लगातार मना कर रहे थे। पंडित नेहरू भी चकरा गए कि वह ऐसा क्यों कर रहे हैं। पंडित नेहरू उनका बहुत सम्मान करते थे। बाद में उन्होंने वहां नहीं जाने के बारे में कारण पूछ ही लिया। पहले तो वह बताने को राजी नहीं हुए, मगर बहुत कहने पर उन्होंने जो कुछ कहा उसे सुनकर पंडित नेहरूकी भी आंखों में आंसू आ गए। शास्त्री जी नेबताया कि कश्मीर में ठंड बहुत पड़ रही है और मेरे पास गर्म कोट नहीं है। पंडित नेहरू ने उसी समय अपना कोट उन्हें दे दिया और यह बात किसी को नहीं बताई। लाल बहादुर शास्त्री जब प्रधानमंत्री बने तो इसी कोट को पहनते रहे। इस प्रकार दो प्रधानमंत्री ने पहना यह कोट। उनके लिए समर्पित इस संग्रहालय में यह कोट प्रदर्शित है। इसी संग्रहालय में रखा गए है प्रधानमंत्री का टूटा कंघा, टूटी टार्च, दाढ़ी बनाने वाली सामान्य मशीन, सामान्य ब्रस व अन्य सामान।जो वहां पहुंचने वाले हर व्यक्ति को चौंकाते हैं कि देश को ऐसा भी प्रधानमंत्री मिल चुका है। इसी संग्रहालय में उनका शयन कक्ष है जिसमें एक तख्त और कुछ कुर्सियां मौजूद हैं। जो कहीं से भी किसी विशिष्ठ व्यक्ति की नजर नहीं आतीं। ऐसे थे इस देश सादगी पसन्द प्रधानमन्त्री श्री लाल बहादुर शास्त्री। जिन पर हर भारत वाशी को नाज हैं, हम नमन करते हैं इस महान व्यक्तित्व को
(संकलित)
गणपत भंसाली सूरत