Saturday, 16 July 2016

गुरु महिमा

 
                                                                                      

गुरु महिमा ... मन मस्तिष्क में भाव अनगिनत थे ...लफ़्ज़ों का भी भण्डार था फिर भी भावों को लफ्ज़ो के साथ बांध पाना दुश्वार सा था ! कभी मिटाना कभी लिखना ...कब तक ..कहाँ तक ? आसमान की ऊंचाई और सागर की गहराई के असंख्य उदाहरण दिए जाते हैं ...लेकिन आज वो भी नाकाफी प्रतीत होते हैं ! तो फिर मेरी सच्ची सरकार ..मेरे गुरुदेव  की रहमतों का कैसे गुणगान करूँ ...?
कैसे बयां करूँ कि जब जब दुःख रुपी अंधकार में ज़िन्दगी बोझिल सी लगने लगती है तब मेरे गुरुदेव की रहमत रौशनी बन मेरे जीवन में उजियारा कर देती है ! मैंने अक्सर तकलीफों को पिछले दरवाज़े से जाते देखा है ...अक्सर खुशियों को आते देखा है ...जब से अपने गुरुदेव को अपना हाथ थामे देखा है ..! कई बार जीवन में ऐसे पड़ाव आये जब लगा कि दुःख अंतहीन हैं ..कैसे इनका सामना करूँ ? तब एक अदृश्य शक्ति ने हमेशा सहारा दिया ...आंसुओं से भरी पलकों और भारी मन में व्याप्त आशंकाओं का निवारण किया ...मेरे सतगुरु ..मेरे गुरुदेव ने ..जब भी मैंने सिमरन किया ,सच्चे मन से जब भी याद किया ! इंसानी फितरत होती है न अपने दुःख तकलीफों से निजात पाने के लिए हम कितने ही पाठ पूजा , व्रत उपवास और ना जाने कितने ही प्रयासों में लगे रहते हैं कि शायद ऐसा करने से हम जल्दी ही अपने दुखो से छुटकारा पा लेंगे ! इसी कवायद में लगे रहते हैं जब तक की दुःख तकलीफ समाप्त न हो जाए ! पर भूल जाते हैं कि जीवन में फूल हैं तो कांटे भी हैं, लेकिन हम काँटों की चुभन से हमेशा दूर भागते हैं ! हाँ, एक रास्ता है अपने जीवन के इन काँटों को निकाल फेंकने का ..वो है अपने गुरु की शरण अर्थात गुरु भक्ति ! ! श्रद्धा विश्वास का जो स्वरुप भक्ति में प्रवाहित होता है वह इंसान का ईश्वर के प्रति प्रेम का ही स्वरुप है ! ईश्वर के इसी स्वरुप को एक भक्त अपने दृष्टिकोण से ..अपने इष्ट देव में अपने आरध्य में देखता है ! इसी एक दृष्टिकोण का एक एक स्वरुप है ..गुरु ...! ईश्वर के ओजस रूप का प्रतिबिम्ब है गुरु ! गुरु ...एक ऐसी शक्ति जो हमारा हाथ थाम कर हमे उस अदृश्य शक्ति तक पहुँचाने का स्त्रोत्र है जिसे हम मानते हैं अपने हृदय के अंतर्मन से ...कि ईश्वर एक शक्ति है ...जो हमारे अंदर ही विदयमान है पर हम उस ईश्वर को उस शक्ति को पहचान नहीं सकते ! इसी शक्ति से ...ईश्वर के स्वरुप से साक्षात्कार करवाते हैं हमे हमारे गुरु ...कहते भी है न ..
गुरु गोविन्द दोउ खड़े काके लागु पाए
बलिहारी गुरु आपनो जिन गोविन्द दियो मिलाये
                                      अर्थात अगर मेरे समक्ष ईश्वर और गुरु दोनों खड़े हैं तो मैं अपने गुरु पर ही बलिहारी जाऊं जिन्होंने मुझे गोविन्द यानि उस ईश्वर से मिलवाया ! सृष्टि के रचयिता ईश्वर हैं तो उस सृष्टि के सरंक्षक गुरु अपने भक्तो का सैदेव ही कल्याण करते हैं !ईश्वर को पाने तक के सफ़र में यदि कोई हमारा साथ निभाता है तो वो हैं हमारे गुरु ! हर इंसान अपने अपने भावो द्वारा अपने प्रेम को ,अपनी भक्ति को ईश्वर के लिए दर्शाता आया है ! पुरातन समय महाभारत ,रामायण के दौरान भी गुरुओं ने अपनी अहम् भूमिका निभाई है ! इंसान ही क्या स्वंयम राम भगवान् ने भी अपने जीवन ,में गुरु वशिष्ट को उच्चतम  दर्ज़ा दिया ! कृष्ण भगवान् ने गुरु अग्रचार्य को अपना गुरु माना ! गुरुनानक देव जी से लेकर दशम पातशाह गुरु गोविन्द सिंह जी तक गुरु अपने हर स्वरुप में अपने भक्तो का मार्ग दर्शन करते आयें हैं! उस निराकार ईश्वर के ओजस का प्रतिबिम्ब है गुरु ...!
अंग संग सहाई बनकर ..कभी हमारे मार्ग दर्शक बनकर ..कभी हमारे सखा बनकर, जीवन की हर विपत्ति में हमारा उद्धार करना ...जब हमारे अपने हमसे मुंह मोड़ ले ..तब एक ही दिव्य शक्ति हमारे संग हमारी ऊँगली थाम कर आगे ले चलती है ! हमे डगमगाने नहीं देती ...! जीवन के हर अवरोध ..हर विघ्न को दूर करना और हमे खुशियों के ख़ज़ाने से फलीभूत करते हैं हमारे गुरु ! बस आवश्यकता है श्रद्धा और विश्वास की ...हमारे गुरुओं की शक्ति को पहचानने की !
          एक अँधा आदमी मंदिर में जाता है !हर कोई उसे देखकर हैरान होता है उअर वह खड़े लोगो में से कोई एक उस अंधे आदमी से पूछता है ..''आप भगवन को देख नहीं सकते फिर आप मंदिर में रोज़ क्यों आये हो ? .
तो अँधा आदमी कहता है ...''तो क्या हुआ ? मैं भगवान को नहीं देख सकता परन्तु भगवान तो मुझे देख ही सकते हैं न ?   अर्थात ऐसी ही श्रद्धा और विश्वास होना चाहिए हमे भी तभी हमारे अंधकार मय जीवन में उजाला होगा ! पर इस उजाले का वरन करने हेतु भी तो हमे हमारे सम्पूर्ण गुरु शक्ति चाहिए वरना उस उजाले का फ़ायदा ही क्या ? सूरज तो सम्पूर्ण जगत को अपना प्रकाश देता है पर यदि कोई इंसान बंद कमरे में ही बैठा रहे और अंधकार को कोसता रहेगा तो उस में सूरज का क्या दोष ? अतः ....
                     चिंतन जब निश्छल होगा 1
                     गुरु के प्रति समर्पित होगा
                     वाणी स्वतः ही मधुर होगी
                     मन निश्चय ही निर्मल होगा
                     दुःख संकट तेरा हर दूर होगा
                     गुरु का हाथ तेरे सर पर होगा
  कण कण में विद्यमान ...ज़र्रे ज़र्रे में शामिल ..हर रिश्ते में समाया ..कभी पिता सा सरंक्षण ..कभी माँ जैसा दुलार ..कभी मित्र की तरह पथ प्रदशक बन कर हमारा मार्ग दर्शन करते हैं ...हर रिश्ते की सम्पूर्णता लिए एक ऐसा रिश्ता ...गुरु और भक्त का ...बस उस रिश्ते को निभाने की कवायद करनी होगी ..सिमरन करके ...विश्वास करके .. ! एक बार श्रद्धा से गुरु महिमा रुपी ऊँगली थाम कर तो देखिये ..हमारे समस्त जीवन की डोर हमारे गुरु थाम लेंगें !
               
                   सतगुरु मेरे तेरी रहमतों का कोई हिसाब नहीं
                   मैं मांगने से थकती नहीं तू देने से थकता नहीं
                   सिलसिला ये यूँ ही बरक़रार रहे सतगुरु मेरे
                   कि तेरी कृपा से झोली हमेशा मेरी भरी रहे
              आमीन ... रश्मि तारिका... सूरत

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